Ek Kavita : ग़ालिब की एक चर्चित ग़ज़ल ‘आ कि मेरी जान को क़रार नहीं है’

इस सीरीज में आज पढ़िए मिर्जा ग़ालिब की एक चर्चित ग़ज़ल ‘आ कि मेरी जान को क़रार नहीं है’-

गिरिया निकाले है तेरी बज़्म से मुझ को
हाये! कि रोने पे इख़्तियार नहीं है

हम से अबस है गुमान-ए-रन्जिश-ए-ख़ातिर
ख़ाक में उश्शाक़ की ग़ुब्बार नहीं है

दिल से उठा लुत्फे-जल्वाहा-ए-म’आनी
ग़ैर-ए-गुल आईना-ए-बहार नहीं है

क़त्ल का मेरे किया है अहद तो बारे
वाये! अगर अहद उस्तवार नहीं है

तू ने क़सम मैकशी की खाई है “ग़ालिब”
तेरी क़सम का कुछ ऐतबार नहीं है

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