जानिए, प्रेमचंद फिल्म इंडस्ट्री छोड़कर काशी क्यों भाग आये थे, ये था बड़ा कारण

डेस्क। हिंदी कहानियों की जब भी बात होती है तो मुंशी प्रेमचंद का नाम सबसे पहले आता है। हिंदी और उर्दू दोनों भाषाओँ में महारत रखने वाले प्रेमचंद ने हिंदुस्तान के आम जन जीवन की असली कहानी लिखीं। यही वजह है कि हिंदी साहित्य के आसमान पर वे सबसे चमकते सितारें है। प्रेमचंद का जन्म 31 जुलाई, 1880 को बनारस के पास के गांव लमही में हुआ था। मां का साया उनके सिर से बचपन में ही उठ गया था। महज 15 साल की किशोर अवस्था में उनकी शादी हो गई थीं। शादी के कुछ ही समय बाद उनके पिता का भी निधन हो गया। उनके पिता लोकल डाक घर में काम किया करते थे। माता पिता के निधन के बाद उन्हें बेहद अभावों में अपना जीवन जीना पड़ा। आर्थिक परेशानियों से निपटने के लिए प्रेमचंद ने कोट और किताबें बेचना शुरू कर दिया।

सोजे वतन प्रकाशित
एक दिन की बात है प्रेमचंद अपनी दुकान की सारी किताबें लेकर एक स्कूल के हेडमास्टर के पास पहुंचे। उन्होंने प्रेमचंद को अपने स्कूल में अध्यापक नियुक्त कर दिया। लेखन की शुरुआत में वे धनपतराय नाम से लिखते थे। उन्होंने बाद में नवाबराय के नाम से लिखना शुरू किया। हालाँकि उन्हें पहचान मिली मुंशी प्रेमचंद के नाम से। 1907 में उनका पांच कहानियों का संग्रह सोज़े-वतन प्रकाशित हुआ। देशप्रेम एवं आम जनता के दर्द से सराबोर इन कहानियों को अंग्रेजी हुकूमत ने बैन कर दिया। नतीजतन, वे प्रेमचंद के नाम से लिखने लगे। उन्होंने कुल 12 उपन्यास और 300 से अधिक कहानियां लिखीं।

बम्बई से इसलिए भागे
कहानियों के दुनिया से निकलकर प्रेमचंद ने अपनी बात पहुंचाने के लिए फिल्मों को अपना माध्यम चुनना चाहा। इसी मंशा के साथ वे बम्बई जा पहुंचे। यहां उन्होंने 1934 में अजंता सिनेटोन नामक फिल्म कंपनी से कॉन्ट्रैक्ट किया और दो कहानियां ‘शेर दिल औरत’ और ‘मिल मजदूर’ लिखीं। इसके बाद उन्होंने ‘सेवा सदन’ की कहानी लिखी। जिस पर भी फिल्म बनीं। लेकिन निष्कपट प्रेमचंद को जल्द ही बम्बई छोड़ना पड़ा। उन्हें अहसास हो गया था कि फिल्म निर्माताओं का मुख्य उद्देश्य जनता का पैसा लूटना था। उनका जनजीवन में परिवर्तन लाना को उद्देश्य नहीं है। वे 8 हजार रुपए की वार्षिक आय को तिलांजलि देकर एक बम्बई से काशी आ गए।

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